भोपालमध्य प्रदेश

मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा जिला प्रशासन के सहयोग से गढ़कुण्डार महोत्सव की तैयारियां जोरो पर

निवाड़ी महेश चन्द्र केवट की रिपोर्ट

गढ़कुण्डार महोत्सव (27 से 29 दिसम्बर 2025)

मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा जिला प्रशासन के सहयोग से गढ़कुण्डार महोत्सव की तैयारियां जोरो पर

जुझौतिखण्ड (वर्तमान बुंदेलखण्ड) संस्कृति के जनक महाराजा खेतसिंह खंगार क्षत्रीय जयंती के उपलक्ष्य में तीन दिवसीय समारोह

जिला निवाडी में क्षत्रीय खंगार समाज का ऐतिहासिक तीर्थस्थल एवं सामाजिक आस्था का केन्द्र गढ़कुण्डार है। गढ़कुण्डार में वर्ष 2006 में समाज के राष्ट्रीय महाधिवेशन में मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा क्षत्रीय खंगार वंश के जनक महाराज खेतसिंह की जयंती के उपलक्ष्य में गढ़कुडार महोत्सव प्रत्येक वर्ष 27 से 29 दिसम्बर (तीन दिवसीय) संस्कृति संचालनालय एवं जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजन सुनिश्चित किया गया।

मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग एवं जिला प्रसाशन के सहयोग से तीन दिवसीय गढ़कुण्डार महोत्सव का आयोजन किया जाता है जिसमे प्रथम दिवस 27 दिसम्बर को महाराजा खेतसिंह की जयंती मनाकर खंगार क्षत्रीय वंश की कुलदेवी गजानन माता के मन्दिर तक विशाल शोभा यात्रा निकाली जाती है जिसमें भारत देश के विभिन्न प्रदेशो से समाज के लाखों की संख्या में लोग एकत्रित होते है देशी विदेशी पर्यटक भी सैकडो की संख्या में मध्यप्रदेश शासन के इस कार्यक्रम में उपस्थित रहकर इतिहास के बारे में जानकारी एकत्रित करते है तथा संस्कृति से परिचित होते है खंगार क्षत्रीय समाज के द्वारा तीन दिन लगातार निःशुल्क भण्डारा (भोजन) कराया जाता है जिसमें तीन दिन क्षेत्रीय लोगो के द्वारा उक्त महोत्सव में उपस्थिति होकर पुण्य का लाभ लिया जाता है। शाम के समय मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग की ओर से विभिन्न प्रदेशो की संस्कृति से ओत प्रोत सांकृतिक कार्यक्रम आयोजित होते है साथ में मेला भी लगता है क्षेत्रीय जनता में उक्त महोत्सव को संम्पन्न कराने के लिए जोश के साथ कार्य किये जाते है जनता मे उत्साह बना हुआ है इस बार भी गढ़कुण्डार महोत्सव में लाखो श्रृद्धालुओं के शामिल होने की सम्भावना है।

इतिहास स्वतंत्र खंगार हिन्दू राज्य जुझौतिखण्ड (वर्तमान बुन्देलखण्ड) की स्थापना शूरवीर महाराजा खेतसिंह ने सन् 1182 में की थी इनका जन्म जूनागढ़ (गुजरात) के राजा रूढदेव के यहां दिनांक 27 दिसम्बर 1140 में हुआ था। राजा रूढदेव एवं सोमेश्वर (पृथ्वीराज चौहान के पिता) दोनो घनिष्ठ मित्र थे इस कारण पृथ्वीराज चौहान एवं खेतसिह भी आपस में बाल सखा हो गये हमेशा दोनो साथ रहे खेतसिंह वीर योद्वा थे। पृथ्वीराज चौहान के साथ संयोगिता स्वयंवर से लेकर तराइन के भीषण युद्ध तक साथ रहे। महाराज खेतसिंह के शौर्य का वर्णन चंद्रवरदाई कृत्य ‘पृथ्वीराज रासो ने दिया है इनको बचपन में सभी खेता के नाम से पुकारते थे। महाराजा खेतसिंह एवं उनका दल (खंग) तलवार चलाने में निपुण था एवं खंग से ही युद्ध लड़ते थे वस्तुता खंग को धारण करने वाले खंगार कहलाये।

पृथ्वीराज चौहान के साथ रहकर महोबा सिरसागढ़, वैरागढ़, कालिंजर सहित अन्य युद्ध जीते अंत में गढ़कुडार को जीता यह स्वयं की उपलब्धि मानकर पृथ्वीराज चौहान ने इन्हें गढ़कुडार का स्वतंत्र शासक माना एवं गढकुडार अधिपति बनाया इन्होने अपने कार्यकाल में अनेक संस्कारो से संस्कारित किया उन्होने अपने शासनकाल में गढ़कुडार की दुर्ग को भव्यता का रूप देकर आश्चर्य जनक कला कृतियो से संजोया जो आज भी पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है एवं पर्यटको के आकर्षण का केन्द्र विन्दु बना हुआ है।

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